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श्रीकृष्ण एक मनोभाव

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 श्याम सूने हृदय तट पर बाँसुरी ऐसी बजाओ हों तरंगित भाव उर के और तुम नैनों में आओ । फिर जहाँ तक दृष्टि जाए फिर जहाँ तक सृष्टि छाए अन्त क्या, आरम्भ क्या हृद शान्त सर में मुस्कुराओ । हो गई राधा भी पूजित श्याम तेरी प्रीत से जो न होते तुम प्रणेता इस अनोखी रीत के। कौन ?नैनों की समझता कौन ? दिल की, बिन कहे द्वार पर मैं भी खड़ी हूँ दीप हाथों में लिए । 

🌈🌈बेटियां बड़ी हो जाती हैं🌈🌈

🎆🎆🎆🎆🎆🎆🎆 कब रुकती हैं नदियों सी ये चंचल ,शीतल सी वेगमयी । "रुक जा, मत कर" कहते-कहते बेटियां बड़ी हो जाती हैं । माँ-पिता की आँखों का तारा चिंता, पीड़ा, जल आँखों का । बहती आँखें रुकत...

15 जून

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मन्द , मन्थर चाल से आ ऐ सखी , वर्षा प्रिये ! ! सूखकर विह्वल है धरती विकल है तेरे लिए ।                वन पुकारे, जन पुकारे                 पशु , जगत - चेतन पुकारे                 आ झमाझम , तू भिगा दे                   प्राण हैं तेरे सहारे । पर इजाजत बादलों को इस कदर देना नहीं दर्प है उड़ने का इनको फट न जायें ये कहीं ।             इनका आना , गड़गड़ाना             जी डरा देता सखी             दिल कहाँ भूला अभी             "केदार " जैसी त्रासदी ।

मस्त बुढ़ापा

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अनुभवों के ताप से तो बुद्धि पकती है सदा उम्र बढ़ते वक्त का अंजाम जानिए । बदन की झुर्रियां हटाकर देख लो भीतर अगर दिल मिलेगा आज भी नादान जानिए। हसरतें तो आज भी कागज की कश्ती सी ही हैं बुलबुलों पर तैरता जहान जानिए । मस्त अब भी हैं सनक अपनी लिए दूसरी दुनिया से है अन्जान जानिए । अब उतरना और चढ़ना हो गया जिन्दगी आराम का   मैदान जानिए । कौन कहता है कि खाली हो गये पास  अपने और का सामान जानिए ।

कामकाजी माँ

परंपरागत माँ से थोड़ा अलग होती है , कामकाजी माँ। कुछ-कुछ पिता की तरह कुछ माँ की तरह होती है, कामकाजी माँ । घर और दफ्तर के बीच पिसी हुई न जाने कितनी कसौटियों पर कसी हुई नाप-तौल कर च...

आत्महत्या

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वर्षों पहले आत्महत्या की थी जिसने उसको, शुकून कितना मिला पता नहीं पर लोग आज भी कायर कहते है उसे । उसके मरने से किसी को फायदा अवश्य हुआ होगा उसके खेत में उगी इमारत के मोटे बीम यही कहते है जैसे । उसके जाने के बाद यहां क्या से क्या हो गया दृग कोटरों से बेतहाशा बाहर निकली हुई उसकी आँखें देखती होंगी क्या ? वो कहाँ गया ? किसी को पता नहीं, जिसकी खातिर.... वो तो अभी भी चिपका हुआ है कपालों से वो मिटा सकता था उलट सकता था माने हुए दैव को औरों के लिए, अपने लिए वो , कोई तो होगा , आखिर....

"शब्द और वो"

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           'आहिस्ता' शब्द नहीं है उसके लिए क्योंकि वह पहाड़ी नदी है उड़ता झरना है क्योंकि उसे अभी मीलों तय करना है वह चली है रिसता मटका लिए आहिस्ता शब्द नहीं है उसके लिए। उसे तो पैदा होते ही सयानी हो जाना है ससुराल जाना है घर सम्भालना है जवानी में बूढी  हो जाना है पत्थरों के सीने पर कुछ निशान बनाकर मिट्टी में पसीना उगाकर मेहनत की खुशबू देकर चले जाना है आँखों में कई कई सपने लिए आहिस्ता शब्द नहीं है उसके लिए।