आत्महत्या
वर्षों पहले आत्महत्या की थी जिसने उसको, शुकून कितना मिला पता नहीं पर लोग आज भी कायर कहते है उसे । उसके मरने से किसी को फायदा अवश्य हुआ होगा उसके खेत में उगी इमारत के मोटे बीम यही कहते है जैसे । उसके जाने के बाद यहां क्या से क्या हो गया दृग कोटरों से बेतहाशा बाहर निकली हुई उसकी आँखें देखती होंगी क्या ? वो कहाँ गया ? किसी को पता नहीं, जिसकी खातिर.... वो तो अभी भी चिपका हुआ है कपालों से वो मिटा सकता था उलट सकता था माने हुए दैव को औरों के लिए, अपने लिए वो , कोई तो होगा , आखिर....