๐๐เคฌेเคिเคฏां เคฌเฅी เคนो เคाเคคी เคนैं๐๐
🎆🎆🎆🎆🎆🎆🎆
कब रुकती हैं नदियों सी ये
चंचल ,शीतल सी वेगमयी ।
"रुक जा, मत कर" कहते-कहते
बेटियां बड़ी हो जाती हैं ।
माँ-पिता की आँखों का तारा
चिंता, पीड़ा, जल आँखों का ।
बहती आँखें रुकते-रुकते
बेटियां बड़ी हो जाती हैं ।
प्लास्टिक के रसोई के बर्तन
जो खेल खिलौने होते हैं ।
उनके पकवान पकते-पकते
बेटियाँ बड़ी हो जाती हैं ।
दिल में है बात कि , तेरे बिन
"जीवन कट पायेगा कैसे ?"
ये बात मगर कहते-कहते
बेटियां बड़ी हो जाती हैं ।
क्या बनेगी ये ? कैसे? कबतक ?
कितने सवाल आते-जाते ।
इन प्रश्नों के रहते-रहते
बेटियां बड़ी हो जाती हैं ।
🎆🎆🎆🎆🎆🎆🎆
Comments
Post a Comment