श्रीकृष्ण एक मनोभाव

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श्याम सूने हृदय तट पर
बाँसुरी ऐसी बजाओ
हों तरंगित भाव उर के
और तुम नैनों में आओ ।
फिर जहाँ तक दृष्टि जाए
फिर जहाँ तक सृष्टि छाए
अन्त क्या, आरम्भ क्या
हृद शान्त सर में मुस्कुराओ ।
हो गई राधा भी पूजित
श्याम तेरी प्रीत से
जो न होते तुम प्रणेता
इस अनोखी रीत के।
कौन ?नैनों की समझता
कौन ? दिल की, बिन कहे
द्वार पर मैं भी खड़ी हूँ
दीप हाथों में लिए ।
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