15 जून
मन्द , मन्थर चाल से आ ऐ सखी , वर्षा प्रिये ! ! सूखकर विह्वल है धरती विकल है तेरे लिए । वन पुकारे, जन पुकारे पशु , जगत - चेतन पुकारे आ झमाझम , तू भिगा दे प्राण हैं तेरे सहारे । पर इजाजत बादलों को इस कदर देना नहीं दर्प है उड़ने का इनको फट न जायें ये कहीं । इनका आना , गड़गड़ाना जी डरा देता सखी दिल कहाँ भूला अभी "केदार " जैसी त्रासदी ।